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Sunday, October 5, 2014

तुम्हारे पास वक़्त तो होगा न.....

अनकहे रिश्तों के
बोझ से दबे हम
जब जबरन लाते हैं
शब्द
हमारे बीच
तब घटते शब्दों के दायरे
और उंघते प्रश्नों के सहारे
हम बहलाते हैं खुद को
पर  यकीन मानो
एक दिन
जब ख़ामोशी की पतली डोर
बाँधेगी  हमे
(हमारे रिश्ते न भी बंधे तो भी )
मिलोगी तुम यूँ ही
कभी कहीं रास्ते, बसस्टॉप या मेट्रो में
तो मैं बुद्ध की तरह शांत न रहूँगा
क्योंकि आता है मुझे
गणितीय नियम
रिश्तों का जोड़
विछोह का घटाव
बस कहकहे लगा सुनाऊंगा किस्से
तुम्हारे पास वक़्त तो होगा न।


रंगनाथ रवि