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Wednesday, July 10, 2013

बस यूं ही .............

तुम्हारे और मेरे बीच कुछ भी तो ऐसा नहीं की जैसा कारण जौहर दिखाता है अपनी फिल्मों मे या राजेश खन्ना की फिल्में ........... पर यकीन जानो ....... 
अच्छा सुनो वो कल जो काम लिया था पूरा किया ... 
नहीं तो अभी कहाँ हुआ है ...
तो फिर करो न । चलो फिर बाद मे मिलते हैं 
कभी प्यार वाले फिल्मी शब्द न मैंने कहे न तुमने सुने (पूरा करने का मौका ही कब मिला)......................... पर प्यार तो है ही ... 

पीछे कैंटीन मे नयी हिन्दी फिल्म का गाना बज रहा था और मैं उसे जाते हुए देख रहा था ... देख रहा था ।


रंगनाथ रवि

अब सपनों को वो छूती नहीं.....

वो लौट रही थी हॉस्टल से.. 
कागज़ के पुलिन्दों को सहेज कर
रखते हुए, कहा था उसने
सहेज लिया है मैंने यादों को,
सपनों को कार्टून में...
(उम्मीद थी) घर में एक कोना तो
मिल जायेगा इन्हे..

पर अलहड़ को, पता कहाँ
उसके  पीछे घर कितना बदल गया
हर कोने की हद बांध दी गयी है
उसी के हदों की  तरह ही,
बाँट दिए गए हैं हिस्से
और उसके हिस्से कोई कोना नहीं आया..
वो तो आँगन बीच बने
मंडप और वेदी के हिस्से आई है..

सपनो-यादों के कार्टून को
डाल दिया है छज्जे पर
अब सपने सिर्फ दीखते हैं
अब सपनों को वो छूती नहीं.. 

चिन्मय झा