वो लौट रही थी हॉस्टल से..
कागज़ के पुलिन्दों को सहेज कर
रखते हुए, कहा था उसने
सहेज लिया है मैंने यादों को,
सपनों को कार्टून में...
(उम्मीद थी) घर में एक कोना तो
मिल जायेगा इन्हे..
पर अलहड़ को, पता कहाँ
उसके पीछे घर कितना बदल गया
हर कोने की हद बांध दी गयी है
उसी के हदों की तरह ही,
बाँट दिए गए हैं हिस्से
और उसके हिस्से कोई कोना नहीं आया..
वो तो आँगन बीच बने
मंडप और वेदी के हिस्से आई है..
सपनो-यादों के कार्टून को
डाल दिया है छज्जे पर
अब सपने सिर्फ दीखते हैं
अब सपनों को वो छूती नहीं..
चिन्मय झा
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